स्वतंत्रता के पूर्व महिला आंदोलन
प्रस्तावना
भारत में
महिला आंदोलन की शुरुआत मुख्यतः 19वीं शताब्दी में हुई। उस समय भारतीय समाज
में महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। समाज में सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, विधवाओं की दयनीय स्थिति,
शिक्षा की
कमी तथा संपत्ति और राजनीतिक अधिकारों से वंचित होना जैसी अनेक समस्याएँ थीं। इन
कुरीतियों के विरोध और महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के उद्देश्य से महिला आंदोलन
की शुरुआत हुई। प्रारंभिक चरण में इस आंदोलन का नेतृत्व पुरुष समाज सुधारकों ने
किया, लेकिन
धीरे-धीरे महिलाओं ने स्वयं भी संगठित होकर आंदोलन को आगे बढ़ाया।
1. पुरुष समाज सुधारकों का योगदान
स्वतंत्रता
से पूर्व महिला आंदोलन की शुरुआत में पुरुष समाज सुधारकों की महत्वपूर्ण भूमिका
रही। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया और उनके प्रयासों से 1829
में सती
प्रथा को समाप्त किया गया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के समर्थन
में आंदोलन चलाया और बाल विवाह का विरोध किया। ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज और आर्य समाज
जैसे संगठनों ने भी महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा
दिया। इन सुधार आंदोलनों ने महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने की दिशा में
महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।
2. महिलाओं द्वारा संचालित संगठन और आंदोलन
समय के साथ
महिलाओं ने स्वयं भी अपने अधिकारों के लिए संगठन बनाए। स्वर्णकुमारी देवी ने 1882 में “स्त्री सोसाइटी” की स्थापना की, जिसका उद्देश्य महिलाओं को शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान करना
था। पंडिता रमाबाई ने “आर्य
महिला समाज” की स्थापना की और महिलाओं की शिक्षा तथा सामाजिक सुधार के लिए
कार्य किया। सरला देवी चौधुरानी ने 1910 में “भारत स्त्री मंडल” की स्थापना की,
जिसका
उद्देश्य सभी वर्गों की महिलाओं को एकजुट करना और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष
करना था। इन संगठनों ने महिलाओं में जागरूकता और संगठनात्मक शक्ति को बढ़ाया।
3. महिला आंदोलन के प्रमुख मुद्दे
स्वतंत्रता
पूर्व महिला आंदोलन के मुख्य
मुद्दों में महिला शिक्षा, सामाजिक और राजनीतिक अधिकार तथा निजी कानूनों
में सुधार
शामिल थे। महिला शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया क्योंकि शिक्षा को महिलाओं के
सशक्तिकरण का आधार माना गया। सावित्रीबाई
फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल खोलकर महिला शिक्षा के क्षेत्र में
महत्वपूर्ण योगदान दिया। महिलाओं ने राजनीतिक अधिकारों के लिए भी संघर्ष किया। 1917
में
“विमेन्स इंडियन एसोसिएशन” की स्थापना हुई, जिसने महिलाओं को मताधिकार और राजनीतिक
प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए आंदोलन चलाया। इसके अतिरिक्त महिलाओं ने बाल विवाह,
पर्दा प्रथा
और दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी आवाज उठाई। 1927 में
“अखिल भारतीय महिला सम्मेलन” का आयोजन किया गया, जिसमें महिलाओं से जुड़े अनेक सामाजिक और कानूनी
मुद्दों पर चर्चा हुई।
4. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
स्वतंत्रता
आंदोलन के दौरान महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया। स्वदेशी आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत
छोड़ो आंदोलन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी रही। महात्मा गांधी के नेतृत्व
में महिलाओं को आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया गया। सरोजिनी नायडू,
अरुणा आसफ
अली, विजयलक्ष्मी
पंडित और सुचेता कृपलानी जैसी महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण
भूमिका निभाई। महिलाओं ने धरना-प्रदर्शन, जुलूस और जेल यात्राओं के माध्यम से
ब्रिटिश शासन का विरोध किया।
5. श्रम आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी
स्वतंत्रता
से पहले महिलाओं ने श्रमिक आंदोलनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनसूया साराभाई ने अहमदाबाद के
कपड़ा मिल मजदूर आंदोलन का नेतृत्व किया और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष
किया। इससे महिलाओं में नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जागरूकता का विकास हुआ।
निष्कर्ष
इस प्रकार
स्वतंत्रता के पूर्व महिला आंदोलन ने भारतीय समाज में महिलाओं के अधिकारों और
समानता के विचार को मजबूत किया। इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप महिला शिक्षा का
प्रसार हुआ, सामाजिक
कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता बढ़ी और महिलाओं की राजनीतिक तथा सामाजिक भागीदारी
में वृद्धि हुई। स्वतंत्रता पूर्व महिला आंदोलन ने आधुनिक भारत में महिला
सशक्तिकरण की नींव रखी और आगे आने वाले समय में
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