Gender: A Sociocultural Construct versus Biological Determinism. Analyze.
जेंडर : एक सामाजिक सांस्कृतिक निर्माण बनाम जैविक नियतिवाद। विश्लेषण करें
1. जैविक नियतिवाद (Biological Determinism)
परिभाषा: जैविक नियतिवाद का अर्थ है कि हमारा व्यवहार हमारी आनुवंशिक सामग्री से निर्धारित होता है। हमारे पास स्वतंत्र इच्छा नहीं है और जब हम पैदा होते हैं तो सब कुछ निर्धारित होता है।
जैविक नियतिवाद (Biological Determinism) वह मान्यता है कि मानव व्यवहार, बुद्धिमत्ता, क्षमताएँ और सामाजिक भूमिकाएँ मुख्य रूप से आनुवंशिकी (genetics) या शारीरिक संरचना द्वारा निर्धारित होती हैं, न कि पर्यावरण या विकल्पों से। यह विचार मानता है कि नस्ल, लिंग, और अन्य लक्षण जन्मजात, स्थिर और अपरिवर्तनीय होते हैं। इसका उपयोग अक्सर सामाजिक असमानता को न्यायसंगत ठहराने के लिए किया जाता रहा है।
मुख्य बिंदु:
- मूल अवधारणा: यह सिद्धांत मानता है कि व्यक्ति का भाग्य उसके जीव विज्ञान (जीन, डीएनए) द्वारा पहले ही निर्धारित कर दिया जाता है।
- अपराधशास्त्र में: कुछ जैविक नियतिवादी मानते हैं कि कुछ लोग अपनी आनुवंशिक बनावट के कारण जन्मजात अपराधी होते हैं।
- सामाजिक असमानता: इसका उपयोग नस्लीय और लैंगिक अंतरों को ‘प्राकृतिक’ बनाकर स्थापित hierarchy (जैसे पुरुष प्रभुत्व) को उचित ठहराने के लिए किया गया है।
- सुजननशास्त्र (Eugenics): 20वीं सदी की शुरुआत में, इस धारणा ने सुजननवाद आंदोलन को बढ़ावा दिया, जिसके तहत अयोग्य माने जाने वाले लक्षणों वाले लोगों के जबरन बंध्याकरण (sterilization) जैसे कानून बने।
- पर्यावरण की उपेक्षा: यह दृष्टिकोण व्यक्ति के विकास में सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों की अनदेखी करता है।
2. सामाजिक सांस्कृतिक निर्माण (Sociocultural Construct)
परिभाषा: एक समाजशास्त्रीय सिद्धांत है जिसके अनुसार, हमारी वास्तविकता, ज्ञान और समझ प्राकृतिक न होकर, सामाजिक अंतःक्रियाओं (social interactions), साझा विश्वासों और भाषा के माध्यम से निर्मित होती है। यह सिद्धांत बताता है कि लिंग (gender), रीति-रिवाज जैसी धारणाएँ समाज द्वारा गढ़ी गई हैं।
जेंडरिंग प्रक्रिया (Gendering): प्रत्येक संस्कृति में बालिकाओं और बालकों के मूल्यांकन का अपना एक मार्ग है, और इनको अलग-अलग भूमिका, प्रतिक्रिया और लक्षण प्रदान करने का। सभी सामाजिक और सांस्कृतिक “पैकेजिंग”, जो कि बालिकाओं और बालकों के जन्म से ही आरंभ हो जाती है, उसे जेंडर संबंध (gendering) कहते हैं।
व्यावहारिक उदाहरण:
- जब एक नवजात शिशु पैदा होता है तो पूरा परिवार उत्साह से जश्न मनाता है।
- नवजात शिशु के सेक्स के आधार पर इस जश्न में अंतर आ जाता है।
- सबसे पहले परिवार और समाज, रंगों के कोड के प्रतिमान का अनुसरण करते हुए, शिशु को पहचानने के लिए कपड़ों का निर्धारण करते हैं।
बालिका के लिए: गुलाबी कपड़े तथा गुड़िया और खाना पकाने वाले बर्तनों का सेट जैसे खिलौने खरीदे जाते हैं।
बालक के लिए: नीले कपड़े तथा कार और मोटरसाइकिल जैसे खिलौने खरीदे जाते हैं।
- परिवार और समाज शिशु के प्रति सर्व-समाए व्यवहार की रचना भी करते हैं, जो बालक के प्रति अलग किस्म का और बालिका के प्रति बिल्कुल दूसरे किस्म का होता है।
- छोटी बालिका को “खूबसूरत परी” कहा जाता है, जबकि छोटे बालक को बहादुर और मजबूत बनाते हुए उसे रोने की सलाह दी जाती है क्योंकि रोना-विल्लाना स्त्रीोचित गुण के रूप में देखा जाता है।
इस तरह ठीक उसी क्षण से जेंडर की निर्माण प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिस क्षण एक शिशु पैदा होता है।
आलोचना (Criticism)
आधुनिक विज्ञान के अनुसार, मानव विकास में जीन और पर्यावरण दोनों की भूमिका होती है। बायोलॉजिकल डिटर्मिनिज्म के अनुसार, समान जीनोटाइप वाले व्यक्तियों में भी भिन्न लक्षण दिख सकते हैं, जिसका अर्थ है कि “जीन ही भाग्य नहीं हैं”।
यह सिद्धांत समाजजीवविज्ञान (sociobiology) और वैज्ञानिक नस्लवाद से भी जुड़ा रहा है, जिसे कई वैज्ञानिक त्रुटिपूर्ण मानते हैं।
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